Friday, 23 October 2009

EK BAND LIFAFE KI KHULI TAHREER

आज अपने किताबो को नए अलमारी में सजा रहा था तो एक ख्याल ने मुझे बेदार किया की कल जब मेरा बेटा बड़ा होगा तो क्या वो इनको सहेज पायेगा? जिन किताबो को मैंने इतने दुलार से पाला है, गले से लगाया है क्या वो उन्हें अपना पायेगा? कल जब बड़ा होकर मुझसे पूछेगा की आपने मेरे लिए क्या छोडा है तो क्या मै गर्व से बता पाऊंगा के मैंने तुम्हारे लिए कोई घर, बंगला या कार नहीं छोडा हैं, छोडा है तो सिर्फ ये किताबे! ये किताबे जिन्हें खरीदते वक़्त तुम्हारे पिता उतने ही खुश हुए थे जब वो पिता बने थे | क्या तब वो मेरी उन बातों और किताबो को ग्रहण कर पायेगा? क्या उसे इन किताबो को ग्रहण करते समय वो ख़ुशी होगी जो मुझे इन्हें सहेजते हुए हुई थी | आज का दौर तो ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिलाता है लेकिन प्रकृति से आशावादी होने के कारण मैं इस विश्वास को दिल में दबाये रखा हूँ के उसे मेरी ये विरासत ग्रहण करते समय अपने पिता पर गुस्सा नहीं आएगा | वो अपने पिता को गालियाँ नहीं देगा | वो किताबो की दुनिया से दूर नहीं भागेगा बल्कि उसे अपनाएगा | मेरी इस आशा के पीछे मानव सभ्यता का लम्बा इतिहास है जो उसके अन्दर जिज्ञासा को मरने नहीं देता|

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