Sunday, 6 December 2009

paa

कल यानि 5 दिसंबर 2009 को फिल्म "पा" देखी नागपुर के लिबर्टी सिनेमा में | निस्संदेह अमिताभ बच्चन के बेहतरीन अभिनय और अपने विषय वास्तु के लिए यह फिल्म देखनी चाहिए | लेकिन इसके treatment में कही कुछ कमी ज़रूर रह गयी हैं|  फिल्म का पहला half तो बोरिंग हैं लेकिन दुसरे half में फिल्म गति पकड़ लेती हैं| अभिषेक बच्चन राजनीतिज्ञ के रूप में फिट नहीं बैठते हैं| फिल्म में उन्होंने एक विवादित मुद्दे को छेड़ दिया हैं| स्लम के redevelopment के issue को बड़े ही हलके से ले लिया हैं हालाँकि यह फिल्म का subject यह नहीं हैं| इस मुद्दे को विस्तार से अगले पोस्ट में डील करेंगे | विद्या बालन एक बेहतरीन एक्टर हैं और उनका फिल्म का selection बताता हैं कि वो बहुत sensitive भी हैं | आर. बल्कि का निर्देशन सामान्य हैं और अभी उन्हें पटकथा की तरफ ध्यान देना होगा | इल्लैया राजा का संगीत फिल्म की जान नहीं बन पाया हैं| कुल मिलाकर पा एक उच्च कोटि की फिल्म बन सकती थी | चलते-चलते भारत ने टेस्ट क्रिकेट में icc टेस्ट ranking में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया हैं| ख़ुशी की बात हैं | लेकिन विदेशी पिचों पर अभी उसे और कई टेस्ट जीतने होंगे अपने आपको साबित करने के लिए|

Tuesday, 3 November 2009

SURAIYYA KAMLA DAS

स्नातक की पढाई के दौरान जब कमला दास की अंग्रेजी कविता " द सनशाइन कैट " को प्रोफैसर पढ़ा रहे थे तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी घृणा तो नहीं थी लेकिन नेगेटिव टोन तो ज़रूर था | तब शायद मुझे इतना प्रभाव नहीं पड़ा था| लेकिन आज जब मैं जब कमला दास या सुरैय्या कमला दास को पढता हूँ तो निश्चिंत रूप से कह सकता हूँ कि वो इस सदी की बेहतरीन कहानीकार व कवियत्री हैं और इससे भी बढ़कर वो सर्वश्रेष्ट महिला कार्यकर्ता हैं| साहित्य  अकादमी की अंग्रेजी पत्रिका इंडियन लिट्रेचर में छपे  उन पर लिखे गए आलेखों और उनकी रचनाएँ पढने के बाद अपने प्रोफेसरों के नैतिक व अनैतिक के द्वंद के सिकुडे हुए मस्तिष्क पर एक संवेदना ही प्रकट करने को जी  चाहता हैं | कमला  दास ने स्त्री-पुरुष संबंधो में बराबरी की मांग की जो पुरुषों को व उनके द्वारा बनाये गए नैतिक व अनैतिकता के पाखंड को एक चैलेन्ज था | कमला दास की सबसे बड़ी विशेषता पश्चिम की महिलावादी लेखको के विपरीत पुरुषों से घृणा न होकर पुरुषों के समकक्ष स्पेस की लडाई हैं| उनके निधन ने भारतीय साहित्य में एक शून्य ला दिया हैं जिसे आसानी से भर पाना असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल तो ज़रूर हैं.

Friday, 23 October 2009

EK BAND LIFAFE KI KHULI TAHREER

आज अपने किताबो को नए अलमारी में सजा रहा था तो एक ख्याल ने मुझे बेदार किया की कल जब मेरा बेटा बड़ा होगा तो क्या वो इनको सहेज पायेगा? जिन किताबो को मैंने इतने दुलार से पाला है, गले से लगाया है क्या वो उन्हें अपना पायेगा? कल जब बड़ा होकर मुझसे पूछेगा की आपने मेरे लिए क्या छोडा है तो क्या मै गर्व से बता पाऊंगा के मैंने तुम्हारे लिए कोई घर, बंगला या कार नहीं छोडा हैं, छोडा है तो सिर्फ ये किताबे! ये किताबे जिन्हें खरीदते वक़्त तुम्हारे पिता उतने ही खुश हुए थे जब वो पिता बने थे | क्या तब वो मेरी उन बातों और किताबो को ग्रहण कर पायेगा? क्या उसे इन किताबो को ग्रहण करते समय वो ख़ुशी होगी जो मुझे इन्हें सहेजते हुए हुई थी | आज का दौर तो ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिलाता है लेकिन प्रकृति से आशावादी होने के कारण मैं इस विश्वास को दिल में दबाये रखा हूँ के उसे मेरी ये विरासत ग्रहण करते समय अपने पिता पर गुस्सा नहीं आएगा | वो अपने पिता को गालियाँ नहीं देगा | वो किताबो की दुनिया से दूर नहीं भागेगा बल्कि उसे अपनाएगा | मेरी इस आशा के पीछे मानव सभ्यता का लम्बा इतिहास है जो उसके अन्दर जिज्ञासा को मरने नहीं देता|